संस्कृति का नाम आए तो नाम हिमाचल होगा,प्यार, दया और भोलेपन का नाम आए नाम हिमाचल होगा।

संस्कृति का नाम आए तो नाम हिमाचल होगा,प्यार, दया और भोलेपन का नाम आए नाम हिमाचल होगा।।

The News Warrior

बिलासपुर : 01  फरवरी

हिमाचल का नाम लेने से पहाड़, बर्फ, सादगी और भोलापन मन में आता है। यहां की संस्कृति खुद विश्व मानचित्र पर है। दूर दूर से सैलानी शिमला कुल्लू मनाली को दौड़े खिंचे चले आते हैं। यहां की वेशभूषा, संस्कृति को कैमरे की आंख ने भी कई मर्तबा कैद करके फिल्म नगरी में के जाया जाता रहा है।

पर सवाल ये भी कि क्या यहां की जी ज़मीनी खूबसूरती है वो क्या बुजुर्गों की आंखो में ही कैद रहकर मर जाएगी या इसे कैद करना और संजोकर रखना ज़िन्दगी का हिस्सा बन जाए। क्या नहीं है इस प्रदेश में। एक बुजुर्ग घराटी घराट या चक्की में आटा पीसता है और दूर दराज के लोग आज भी उस से आटा लेने जाते हैं क्या वह उसकी कला और उसके अनुभव नहीं है?

क्या यह फिल्म और डॉक्यूमेंट्री का हिस्सा नहीं है? क्या एक मंदिर जहां नहाने से या मन्नत मांगने भर से विवाह और बच्चे की इच्छा पूरी होती है ऐसी मान्यताएं क्या हमारा श्रद्धा, संस्कार का हिस्सा नहीं हैं? इनको जब कैमरे की नजर में कैद किया जाएगा और संजोकर सदियों तक प्रस्तुत किया जाएगा तो क्या यह एक उपलब्धि नहीं होगी।

कुछ बाते और दादा दादी की कहानियां उनके साथ ही ख़तम हो जाए जो हमारे लिए जीवन का पाठ पढ़ाती हो ये सब जब फिल्म के रूप मै हमारे पास रहेंगे हमारे वो क्षण और यादें नहीं खत्म होंगी अपितु हमारे आसपास रहेंगी। यह उदाहरण हिमाचली सिनेमा और इसको खूबसूरत बनाने के लिए लेख में दिए हैं।

क्या ऐसा कौशल यहां पैदा नहीं जो हिमाचल के सिनेमा को बढ़ावा दे और दिखाए? इसका जवाब हां में ही होगा। विभिन्न कलाओं से परिपूर्ण कलाकारों, निर्माताओं को जब मंच मिलेगा तब निश्चित रूप से कमाने के लिए बाहर नहीं जाना पड़ेगा अपितु स्वयं खुले रूप में कार्य आएगा। फिर हिमाचल की छवि सिर्फ पहाड़ , बर्फ़, मलाना क्रीम से उठकर हिमाचल के बेस्ट निर्देशक, बेस्ट एक्टर और एक्ट्रेस, बेस्ट लेखक, बेस्ट कैमरामैन, बेस्ट एडिटर में भी होगी जब सिनेमा का दौर यहां रोजगार खोलेगा।

हालांकि पिछले दौर में कुछ फिल्में बनी है पर प्लेटफॉर्म ना होने के चलते यह उठ नहीं पाई हैं। सरकार ने भी फिल्म सिटी का प्रोजेक्ट हिमाचल में छेड़ा है। इस फिल्म सिटी से कितना रोजगार यहां खुलेगा ये शायद अभी किसी ने सोचा मात्र काम ही है। यहां फटा पोस्टर निकला हीरो नहीं बल्कि गांव गांव से कलाकार और तकनीकी व्यक्ति निकलेगा। आज फिल्म में कम से कम 100+ व्यक्ति चाए पिलाने से लेकर फिल्म रिलीज होने तक काम में आते हैं। उस से यह होगा कि यहां फिल्म संस्थान खुलेंगे।

नई तकनीकें आएगी और रोज़गार के द्वार भी असीमित खुलेंगे। पहाड़ी लोगों के लिए यह बात सही बैठेगी कि गलाणा (बात करना) आए आए ना आए नाटी और नचणा (नाचना) ज़रूर आऊंदा (आता है)। विभिन्न फिल्म उत्सवों ने भी यहां के कलाकारों को अपनी कला प्रदर्शन का मौका ज़रूर दिया है। जैसे हिम सिने सोसायटी की फ़िल्म मेकिंग वर्कशॉप और मोबाइल शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल हो या शिमला और धर्मशाला इंटरनैशनल फ़िल्म फेस्टिवल हो।

अब तो अन्य जिलों में भी फिल्म फेस्टिवल की शुरुवात हो गई है जिसमें बिलासपुर में आने वाले अप्रैल में व्यास फ़िल्म फेस्टिवल (मोबाइल फिल्म फेस्टिवल) का राज्य स्तरीय आयोजन होने जा रहा है। इसे उत्साह और जुनून ना कहा जाए तो क्या कहें? थियेटर को भी शिमला, बिलासपुर, मंडी और कुल्लू जैसे कई जिलों के कलाकारों ने दशकों से परंपरा को चलाकर रखा है। फिल्म सिटी से रोजगार के द्वार कितने खुलेंगे या कल्पना करें कि कितना खुलेगा ये कल्पना और यथार्थ में असीम ही होगा जिसका फायदा युवाओं को मौजूदा समय में मिल जाएगा और प्रदेश उन्नति करेगा।

लेखक

अंकुर

फिल्म निर्देशक एवम् शोधार्थी ( पत्रकारिता एवम् जनसंचार)

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