मस्कुलर डिस्ट्रॉफी के मरीज़ों को समर्पित मानव मंदिर- डॉ.राजेश चौहान

 लेख़क – डॉ.राजेश चौहान 

न्यू शिमला

मस्कुलर डिस्ट्रॉफी के मरीज़ों को समर्पित मानव मंदिर

The News Warrior 

डेस्क  20 फ़रवरी 

 

“मिली थी जिंदगी किसी के काम आने के लिए,

पर वक़्त  काग़ज के टुकड़े कमाने में बीत रहा है”

 

मानवीय मूल्यों से दूर आज के मानव पर यह पंक्तियां बिल्कुल सटीक बैठती हैं। इंसानियत से कोसों दूर हमारे सभ्य समाज के बहुतायत लोग जहां धनोपार्जन की अंधी दौड़ में व्यस्त हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग ऐसे भी हैं जो वास्तव में मानवता को परिभाषित करते हैं।

दया, परोपकार, इंसानियत, मानवता इत्यादि शब्द ऐसे ही लोगों के कारण व्यवहार में हैं ऐसा प्रतीत होता है। ऐसे ही मानवतावादी धर्मपरायण लोगों का समूह है “इंटिग्रेटिड मस्कुलर डिस्ट्रॉफी रिहैबिलिटेशन सेंटर, मानव मन्दिर, सोलन”। मानवता के इस मन्दिर की नींव वर्ष 1992 में मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से प्रभावित तीन व्यक्तियों द्वारा रखी गई तथा वर्ष 1995 में इसे “इंडियन एसोसिएशन ऑफ मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (IAMD)” नाम से  पंजीकृत किया गया। तब से लेकर अब तक यह सोसाइटी मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से प्रभावित लोगों की सेवा में तल्लीन है।

सोलन शहर से मात्र 6 किलोमीटर की दूरी पर कोठो गांव में स्थित यह मानव मंदिर हिमाचल का एक मात्र संस्थान है जहां आधुनिक नंतकनीक से मस्कुलर डिस्ट्रॉफी के रोगियों का उपचार किया जाता है। मानव मंदिर में न केवल हिमाचल से बल्कि देश के कोने-कोने से रोगी यहां इलाज करवाने आ रहे हैं। यह मानव मंदिर अपनी तरह का भारत का पहला केंद्र है जहां रोगियों को थेरेपी दिए जाने के साथ ही परिजनों और रोगी दोनों को जीवन से संघर्ष करने की प्रेरणा दी जाती है। उन्हें जीने का नया मार्ग दिखाया जाता है।

मस्कुलर डिस्ट्रॉफी एक प्रगतिशील न्यूरोमस्कुलर आनुवंशिक विकार को संदर्भित करता है जहां मांसपेशियां धीरे-धीरे अपनी ताक़त खो देती हैं जिससे पूरी गतिहीनता और रोज़मर्रा की गतिविधियों के लिए दूसरों पर निर्भरता हो जाती है। मस्कुलर डिस्ट्रॉफी किसी भी उम्र में हो सकती है। कभी-कभी यह एक परिवार में एक से अधिक भाई-बहनों को प्रभावित करता है।

मुख्य रूप से इस रोग के नौ प्रकार होते हैं, प्रत्येक अलग-अलग मांसपेशी समूहों को प्रभावित करते हैं, अलग-अलग उम्र में लक्षण और लक्षण दिखाई देते हैं, और गंभीरता में भिन्न होते हैं। प्रत्येक प्रकार के मस्कुलर डिस्ट्रॉफी के भीतर विभिन्न प्रकार के आनुवंशिक प्रकार हो सकते हैं और एक ही तरह के मस्कुलर डिस्ट्रॉफी वाले लोगों को विभिन्न लक्षणों का सामना करना पड़ सकता है मस्कुलर डिस्ट्रॉफी का कोई इलाज नहीं है। लेकिन दवाएं और उपचार लक्षणों को प्रबंधित करने में मदद कर सकते हैं।

यह विकार मासपेशियों के रोगों का एक ऐसा समूह है, जिसमें लगभग अस्सी प्रकार की बीमारियां शामिल हैं। इस समूह में कई प्रकार के रोग शामिल हैं, लेकिन आज भी सबसे खतरनाक और जानलेवा रोग ड्यूशेन मस्कुलर डिस्ट्राफी (डीएमडी) है। यदि इस बीमारी का समय रहते इलाज न किया जाए तो अधिकतर बच्चों की मौत 11 से 21 वर्ष के मध्य हो जाती है लेकिन डॉक्टरों और अभिभावकों में उत्पन्न जागरूकता ने इनकी जान बचाने और ऐसे बच्चों की जिंदगी बेहतर बनाने में विशेष भूमिका निभाई है। विशेष रूप से स्टेम सेल और बोन मैरो सेल-ट्रांसप्लांट के प्रयोग से  डीएमडी से प्रभावित मरीजों की उम्र बढ़ाई जा रही है।

ड्यूशेन मस्कुलर डिस्ट्राफी केवल लड़कों में ही उजागर होती है और लड़कियां जीन विकृति होने पर कैरियर (वाहक) का कार्य करती हैं या अपनी संतान को भविष्य में ये बीमारी दे सकती हैं। लड़कियों में इस बीमारी के किसी प्रकार के लक्षण उत्पन्न नहीं होते हैं। मस्कुलर डिस्ट्रॉफी एक अनुवांशिक बीमारी है, जो विशेष रुप से बच्चों में होती है। इस बीमारी से पीड़ित बच्चा किशोर होते-होते पूरी तरह विकलांग हो जाता है।

यह मांसपेशियों का रोग है इसलिए सबसे पहले यह कूल्हे के आसपास की मांसपेशियों और पैर की पिंडलियों को कमजोर करता है। उम्र बढ़ने के साथ यह कमर और बाजू की मांसपेशियों को भी प्रभावित करना शुरू कर देता है। लगभग नौ वर्ष की उम्र के बाद से यह फेफड़े और हृदय की मांसपेशियों को भी कमजोर करना शुरू कर देता है जिससे बच्चे की सांस फूलना शुरू हो जाती है तथा बच्चों की मृत्यु तक हो जाती है। अधिकतर बच्चों की मृत्यु हृदय और फेफड़े फेल हो जाने के कारण होती है।

स्टेम सेल ट्रांसप्लांटेशन से इस बीमारी से ग्रसित रोगी की आयु बढ़ाई जा सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार स्टेम सेल ट्रांसप्लांटेशन से मांसपेशियों में मौजूद सोई हुई या डॉर्मेन्ट सैटेलाइट स्टेम सेल जाग्रत हो जाती हैं तथा वे नई मांस पेशियों का निर्माण करती हैं जबकि ग्रोथ फैक्टर क्षतिग्रस्त मांसपेशियों की रिपेर्यंरग और रिजनरेशन में मदद करता है।

इसीलिए वर्तमान समय में अनेक डॉक्टर स्टेम सेल ट्रांसप्लांट के साथ ‘आईजीएफ -1’ नामक इंजेक्शन का प्रयोग करते हैं, जो एक प्रकार का ग्रोथ फैक्टर है। कई हेल्थ सप्लीमेंट्स इन मरीजों की ताकत बनाए रखने में काफी मदद कर रहे हैं जैसे- ओमेगा-3 फैटी एसिड्स और यूबीनक्यूनॉल और एल-कार्निटीन रसायन इत्यादि।

 

मस्कुलर डिस्ट्रॉफी को लाइलाज बीमारियों की श्रेणी में रखा जाता है। इसलिए ज्यादातर डॉक्टर अभी भी कार्टिकोस्टेरॉयड को मुख्य इलाज के रूप में प्रयोग करते हैं। हालांकि इसके दुष्परिणाम आने पर ज्यादातर रोगियों में इस इलाज को रोकना पड़ता है। इसके इलावा फिजियोथेरेपी का प्रयोग किया जाता है। नये इलाजों में मुख्यत: आटोलोगस बोन मेरो सेल ट्रांसप्लांट और स्टेम सेल ट्रांसप्लांट को शामिल किया जाता है। यह इलाज मांसपेशियों की सूजन कम करने के साथ-साथ नई मांसपेशियों का निर्माण करने में सहायक है।

वास्तव में यह रोग एक जीन विकृति है इसीलिए इसका पुख्ता इलाज जेनेटिक इंजीनियरिंग ही है। अमेरिका में नई टेक्नोलॉजी का प्रयोग कर इन जीन विकृतियों को दूर करने में काफी हद तक सफलता मिली है।

भविष्य में ड्यूशेन मस्कुलर डिस्ट्राफी के कारगर इलाज की संभावनाएं बढ़ने की परिकल्पना है। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि ऐसे मरीजों की स्थिति को और खराब होने से रोका जाए और उन्हें स्टेम सेल ट्रांसप्लांटेशन के साथ-साथ अन्य सहयोगी इलाज उपलब्ध करवाने की हर संभव कोशिश की जाए।

भारत में हर साल लगभग 4000 से ज्यादा बच्चे मस्कुलर डिस्ट्रॉफी के साथ पैदा होते हैं। इंडियन एसोसिएशन ऑफ मस्कुलर डिस्ट्रॉफी देश में मस्कुलर डिस्ट्रॉफी के पुनर्वास और जागरूकता पैदा करने के लिए काम कर रहा है। मानव मंदिर में न केवल हिमाचल से बल्कि देश के कोने कोने से रोगी यहां इलाज करवाने आते हैं। यह मानव मंदिर अपनी तरह का भारत का पहला केंद्र है जहां रोगियों को थेरेपी दिए जाने के साथ ही परिजनों और रोगी दोनों को जीवन से संघर्ष करने की प्रेरणा दी जाती है।

पचास बिस्तरों वाले इस मानव मंदिर में हाइड्रोथेरेपी पूल भी स्थापित किया गया है। इस पूल में मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से प्रभावित रोगियों को हाइड्रो थेरेपी दी जाती है। पहले इस थेरेपी के लिए रोगियों को दिल्ली या देश के किसी अन्य बड़े शहर में जाना पड़ता था। मानवीय सेवा में निस्वार्थ भाव से अनवरत अग्रसर इस संस्था को आर्थिक सहायता की आवश्यकता है।

सीमित संसाधन और स्वयं सेवकों का अभाव कहीं ना कहीं सेवा भाव के ऊपर हावी है। इस पुनीत कार्य को गति प्रदान करने के लिए हम सभी को भी अपने सामर्थ्य के अनुसार इस महायज्ञ में आहुति देने की आवश्यकता है।

नोट – यह लेख़क के व्यक्तिगत् विचार हैं 

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