हिमाचल दिवस विशेष : समग्र व समावेशी विकास की उम्दा मिसाल हिमाचल

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15 /04 /2022

हिमाचल दिवस विशेष:

भारत को मनोरम प्राकृतिक छटाओं से नवाजा गया है, दक्षिण में इसके चरणों को सागर की लहरें धोती हैं तो उत्तर में हिमालय की सफ़ेद चोटियाँ इसका मुकुट बनाती हैं। हिमालय की गोदी में बसा हिमाचल प्रदेश इसी प्राकृतिक सौंदर्य का एक अंश है। हिमाचल वास्तविकता में हिम का घर है। हिमाचल को पश्चिमी हिमालय के नाम से भी जाना जाता है। लम्बे और घने वृक्षों से लदे वन, छोटे-छोटे नाले और नदियां, तीर्थ और मन्दिर, मन्द-मन्द बहती हुई शीतल हवा, हरियाली और पुष्पों के मनमोहक रंग हिमाचल को देवभूमि बनाते हैं। हिमाचल देवभूमि और ऋषि मुनियों की तपोभूमि है। सजी-धजी प्रकृति यहाँ सबका मन मोह लेती है। यहाँ के लंबे और हरे पेड़ इसकी सुंदरता को निखारते हैं।

साधारण रहन-सहन और कठोर परिश्रम, ईमानदारी, भाईचारा इसके मुख्य तत्व है। यहाँ पर साहित्य औऱ पहाड़ी चित्र-शैली का सृजन भी हुआ है। सत्रहवीं और उन्नीसवीं शताब्दियों के बीच अनेक शैलियों का उत्थान-पतन हुआ।

1945 ई. तक प्रदेश भर में प्रजा मंडलों का गठन हो चुका था। 1946 ई. में सभी प्रजा मंडलों को हिमाचल हिल् स्टेट् रीजनल कौंसिल में शामिल कर लिया तथा मुख्यालय मंडी में रखा गया और मंडी के श्री स्वामी पूर्णानंद को अध्यक्ष बनाया गया। हिमाचल हिल् स्टेट् रीजनल कौंसिल के नाहन में 1946 ई. में चुनाव हुए, जिसमें श्री यशवंत सिंह परमार को अध्यक्ष बनाया गया ।

1948 में शिमला में प्रजा मंडल के नेताओं का सम्मेलन हुआ, जिसमें यशवंत सिंह परमार ने कहा कि हिमाचल प्रदेश का निर्माण तभी संभव है, जब शक्ति प्रदेश की जनता औऱ राज्य के हाथ सौंप दी जाए। हिल स्टेट के राजाओं का सम्मेलन मंडी के राजा जोगेंद्र सेन के नेतृत्व में 2 मार्च,1948 को दिल्ली में हुआ। इन राजाओं ने हिमाचल प्रदेश में शामिल होने के लिए 8 मार्च 1948 को एक समझौते पर हस्ताक्षर किए।

 

15 अप्रैल 1948 को स्वतंत्रता प्राप्ति से आठ महीने बाद छोटी-बड़ी 30 रियासतों के विलय के साथ ही यह पहाड़ी प्रदेश अस्तित्व में आया। उस समय हिमाचल प्रदेश का गठन मुख्य आयुक्त के प्रांत के रूप में किया गया था। 15 अप्रैल को हिमाचल दिवस के रूप में मनाया जाता है।
1948 ई. में सोलन की नालागढ़ रियासत कों शामिल किया गया। अप्रैल 1948 में इस क्षेत्र की 27,018 वर्ग कि॰मी॰ में फैली लगभग 30 रियासतों को मिलाकर इस राज्य को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। उस समय हिमाचल प्रदेश में चार जिला महासू, सिरमौर, चंबा, मंडी शामिल किए गए थे। उस समय प्रदेश का कुल क्षेत्रफल 27018 वर्ग किलोमीटर व जनसंख्या लगभग 9 लाख 35 हजार के करीब थी।
बाद में 25 जनवरी, 1950 को हिमाचल को “ग” श्रेणी का राज्य बनाया गया औऱ 1 नवम्बर, 1956 को हिमाचल प्रदेश को केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया गया। 1966 में पंजाब के पहाड़ी क्षेत्रों को हिमाचल प्रदेश में शामिल किया गया। 18 दिसम्बर, 1970 को संसद ने हिमाचल प्रदेश अधिनियम पारित किया तथा 25 जनवरी, 1971 को हिमाचल प्रदेश पूर्ण राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। हिमाचल इसी दिन भारतीय गणतंत्र का 18वां राज्य बना |

 

1948 से अपनी यात्रा शुरू कर 2022 तक प्रदेश के लोगों ने इतने वर्षों में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। प्रदेश के विकास में आने वाली बाधाओं का मुकाबला कर इस पहाड़ी राज्य ने डट कर किया है औऱ सारे देश में एक आदर्श राज्य के रूप में उभरकर सामने आया है। मेहनतकश लोगों की दृढ़ इच्छाशक्ति व उच्च मनोबल से इस अवधि के दौरान हमारे प्रदेश में अभूतपूर्व विकास हुआ है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रदेश की साक्षरता दर जो वर्ष 1948 में मात्र सात फीसदी थी, बढ़कर 2011 की जनगणना में 82.80 फीसदी हो गई है। कुल साक्षरता दर में पुरुषों की दर 89.53 व महिलाओं की 75.93 फीसदी है, जो देश के अधिकांश राज्यों से कहीं बेहतर है। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वरोजगार संपन्नता व स्वावलंबन प्रदेश सरकार का संकल्प है। 55 हजार 673 वर्ग किलोमीटर में फैले हिमाचल की कुल आबादी 2011 की जनगणना के अनुसार 68 लाख 64 हजार 602 है |

 

समय बीतने के साथ साथ हिमाचल प्रदेश ने बहुत प्रगति कर ली है और परिवहन के माध्यम विकसित हुए तथा सड़के भी चौड़ी हुई हैं। शिक्षा के क्षेत्र में आज हिमाचल की दशा बहुत बढ़िया है। विश्व विद्यालय, कॉलेज, हायर सैकेण्डरी स्कूल, मिडल और प्राइमरी स्कूलों की संख्या बढ़ गई है। पहले चिकित्सा की सुविधाएँ कम थीं लेकिन समय के साथ साथ यहाँ पर बहुत से अस्पताल औऱ मेडिकल कॉलेज बने हैं जिससे लोगों का इलाज संभव हुआ और मृत्यु दर कम हुई है अब राज्य भर में अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की संख्या बहुत है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण सेवाओं का निरन्तर प्रसार हो रहा है। हिमाचल ने हर क्षेत्र में उन्नति कर ली है। हिमाचल केरल के बाद भारत का सबसे कम भ्रष्ट राज्य है। हिमाचल ऋषि मुनियों का स्थान है और छुट्टियाँ व्यतीत करने के लिए एक उच्च पर्यटन स्थल भी है |

 

औद्योगिक विकास कठिन होने के बावजूद भी उसके लिए प्रयास किए जा रहे हैं। सोलन तथा कई अन्य नगरों में औद्योगिक बस्तियां बनाई गई हैं तथा सरकार उद्योगपतियों को काफी सुविधाएँ दे रही है। पहाड़ी प्रदेश होने से यहां फल आसानी से पैदा किये जा सकते है जैसे सेब, नाशपाती, खूबानी फलों का सीधा निर्यात किया जाता है। वर्तमान हिमाचल आज अपने नए रूप में प्रवेश कर रहा है। यहाँ पर आधुनिकता और फैशन ने अपना पूरा जाल नहीं बिछाया है क्योंकि भौगोलिक स्थिति के कारण परंपराएँ अभी भी बची हुई हैं। यहाँ कि संस्कृति और रहन सहन में इतिहास की झलक देखने को मिलती है। पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए योजनाएँ तथा सुधार कार्य किए जाते हैं औऱ यहाँ काफ़ी संख्या में सैलानी आते हैं तथा प्रकृति के सौन्दर्य को देख कर प्रसन्न होते हैं । इससे राज्य की समृद्धि औऱ आय के साधनों में भी बढ़ोतरी हुई है। धार्मिक तीर्थ स्थलों ने भी यहाँ समृद्धि लाने में सहायता की है। शिक्षा के विकास ने युवाओं औऱ युवतियों को जीवन की नई दिशा दी है। विद्युत के उत्पादन के लिए छोटे-छोटे पन बिजली घर बनाए जा रहे हैं और सतलुज-ब्यास लिंक परियोजना औऱ अन्य कई योजनाएँ भी हैं।

 

हिमाचल प्रदेश की गिनती देश के सम्पन्न राज्यों में की जाती है। गांवों में बसे इस राज्य में जीवन स्तर अन्य राज्यों की तुलना में कहीं अधिक बेहतर है । हिमाचल प्रदेश की कुछ विशेष जरूरतें भी हैं क्योंकि यह एक पहाड़ी और ग्रामीण राज्य है, मेरा मानना है कि हिमाचल में मुख्य रूप से पर्यटन, सड़क, स्वास्थ्य और रोजगार पर अधिक जोर देना चाहिए | ये सर्व विदित है कि हिमाचल में पर्यटन की असीम सम्भावनाएं हैं। कुदरत ने हिमाचल को बेपनाह खूबसूरती बख्शी है। यहां के पहाड़, नदियां और झीलें किसी का भी मन मोह लेती हैं। हिमाचल में पर्यटन बढ़ने से जो सबसे बड़ा फायदा होगा, वह है- युवाओं को रोजगार मिलना।

लेखक
लेखक- प्रत्यूष शर्मा,

ईमेल- ankupratyush5@gmail.com
फ़ोन-7018829557

 

 

 

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